प्रश्न हमार

हो गयल भवसागर जे पार , ताके उहो तड़ेर के आंख ।

सोच समझ के दिहीं जबाब , ना बा कउनो अलग दबाव ।

चतुराई से तरकस रखले शान पे बान चलउलस के ,

पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 


हम त बिगरल काम बनाईं , पानी पर सेतु पऊड़ाईं ।

मोर क्षमता पे प्रश्न तोहार , फिर से तनिका करा बिचार ।

सागर के पुरुसारथ अपने अंजुरी से खरकउलस के ,

पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 


अवधपुरी के हईं दुलार , काशी मथुरा हवे हमार ।

शिल्पकार हम गंगा के , डमरू शिव अड़भंगा के ।

केशव के उ चक्र सुदर्शन अंगूरी में पहिनउलस के ,

पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 


ना केहुओ से राखी तोड़ , सबका खातिर चार चार गोड़ ।

राम के हाथे धनुष थमउली , संसाधन सबका पहुँचउली ।

शस्त्र शास्त्र के विद्या हमरै हमहि से लुकवऊलस के ,

पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 


केसे केकर रहल लड़ाई , हम ना कबहुँ बैर निभाईं ।

हम केकरा के रहीं चुनौती , जे एह गति के हमरो हस्ती ।

कहे कथानक जे कथावाचक हमरै कथा छुपउलस के ,

पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।

✍ धीरेन्द्र पांचाल


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