हे माधव
आपाधापी लोक लाज का काज तू निश्चित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का अंत सुनिश्चित कर दे । रोजाना की उलझन मुझसे नहीं सही जाती केशव । व्याकुल मन की पीड़ा मुझसे नहीं कही जाती केशव । एक बाण से मृत्यु का, बसंत समर्पित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का अंत सुनिश्चित कर दे । जग जाहिर है सब हारे हैं अपनों के आघात से । मेरे तरकस खाली हो गए धीरे धीरे हाथ से । या तो मेरी चिखों को, उल्लास से सिंचित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का अंत सुनिश्चित कर दे । प्रत्यंचा पर चढ़ी शिखा है मेरे कुल के मान की । भंग होती मर्यादा अब तो आभा धूमिल शान की । टूट रहे परिवारों के, विश्वास तू निर्मित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का अंत सुनिश्चित कर दे । ~ धीरेन्द्र पांचाल