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Showing posts from August, 2020

मत पूछो

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कितना डिजिटल दौर हुआ है मत पूछो । 2G  चारा  कोल  हुआ  है  मत  पूछो  । कहते हैं बस चुप रह कर के देखो तुम , कैसे  शाही  कौर  हुआ  है  मत  पूछो  । पीपल  में  क्यों  बौर  हुआ  है मत पूछो । गुंडों  का  क्यों  शोर  हुआ  है मत पूछो । जेलों  में  पकवान  कहाँ  से  जाते  हैं , कौन किसका सिरमौर हुआ है मत पूछो । भाषण में मौलिकता कितनी मत पूछो । जीवन की सार्थकता कितनी मत पूछो । घूम  रहे  हैं  दिन  भर  सूट  सफारी  में , फटा  जेब  क्यों  नंदू  का है  मत पूछो । आँगन का सरदार कहाँ है मत पूछो । कल का चौकीदार कहाँ है मत पूछो । झुलस  रहा  हूँ सपनों की चिंगारी से , दीपक क्यों गद्दार हुआ है मत पूछो । कैसा ये व्यापार हुआ है मत पूछो । मतदाता बेकार हुआ है मत पूछो । छीन लिए सब रोटी अपने हाथों से , यहाँ रोज इतवार हुआ है मत पूछो । ✍ धीरेन्द्र पांचाल

छात्र जीवन

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बरगद पीपर महुआ आम क छांव याद आवेला । माई के अँचरा में गाँव गिरांव याद आवेला ।। सोरहे बरिस में घर छूट गईल , रह गइलीं सुकुवारे । लोटा थरिया कुकर आपन इहे हव परिवारे । चाउर के गठरी से भयल अलगाव याद आवेला । माई के अँचरा में ............ राती के कोतवाल चनरमा आंख फार के ताके । नींद लगे जस भोरवे सूरज खिड़की चढ़के झाँके । चिरई चहके जस छागल के पाँव याद आवेला । माई के अँचरा में ............. बिना जतन हम दाल भात अउर चोखा ताव से खाईं । इश्क भयल जब चाय से हमके रत रत भर जग जाईं । माई के रोटी प लगावल छाव याद आवेला । माई के अँचरा में ............. आधी रोटी में मेहमानन के पता बतावे कउआ । इहवाँ चारा खाके मनई हो जालें लखनऊआ । दुअरे निबकौड़ी के भयल बिखराव याद आवेला । माई के अँचरा में ............. ✍धीरेन्द्र पांचाल