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लंका करा बिरान

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लंका करा बिरान पवनसूत आवा ना नापा तू असमान पवनसूत आवा ना  धरम करम क होत बा हानि  पानी तोही बचावा  फंस गइलें कुल दुबरा  अबरा अब्बो ठोंके दावा  मेहना मारी गांव जहान पवनसूत आवा ना  लंका करा बिरान पवनसूत आवा ना बिरथा हो जाई दान दिहल कुल  मान बची ना तोहरो  सेवक हउआ रामलला क  भला न होई केहरो  एहरो करा धियान पवनसूत आवा ना लंका करा बिरान पवनसूत आवा ना मानस क चौपाई बचले  काम चली न मालिक  पुरखन क पगड़ी मुँहवा पर  सबके पोती कालिख  सरयू क अभिमान पवनसूत आवा ना लंका करा बिरान पवनसूत आवा ना गज गोनिया से नाप के नाही  बनल केहू ह भगवन  बसूला अउर रुखानी में  फिर काहें होता अनबन  फेंका गदा उतान पवनसूत आवा ना  लंका करा बिरान पवनसूत आवा ना ~ धीरेन्द्र पांचाल 

अरे राम रे राम

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आपन बात  वइसे कहे सुने के त बहुत कुछ बाटे बाकि अपने कविताई के सफऱ के हम इहाँ बतावल चाहब की कविता, गीत लिखे क सउख हमके हमार पिता जी से मिलल उनकर कविता आ छन्दन क हम अपने स्कूल के मंचन से पाठ भी करत रहली। कक्षा एक से लेके दसवीं तक हम गणतंत्र दिवस आ स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल के कवि सम्मेलन में भाग लेहीं आ खूब वाहवाही आ ताली बटोरी। अपने पिता जी क लिखल एक हास्य कविता - "अइलें देखनहरु त मनवा धधाय गयल,   हमके बोलउलें त मन शरमाय गयल।   देखलें त कहलें की लइका त हीरो बाय,   बाकी फुफ्फा बतउलें की पढ़े में जीरो बाय। " के लगभग हर मंच से सुनाईं। लोग खूब ताली बजावे आ सराहे। साथ साथ हम बावला जी एक कविता -  " एक दिन गइली रपट लिखावे, घबड़ायल कुछ माने में,    का बतलाईं ए भइया मोर जेब कट गयल थाने में। " क भी पाठ करी। बस येहीजे से कविता, गीत, छंद के प्रति रूचि बढ़े लगल। बावला जी क किताब "गीतलोक" के हम दू तीन बार पढ़ली। हाई स्कूल के बाद पढ़ाई करे बदे घर से बाहर जाये के पड़ल आ ओह किताब क एक्के प्रति रहला के वजह से हम कहीं लेके जा ना सकी त हम गीतलोक क पूरा पीडीएफ बनाके अप...