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अरे राम रे राम

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आपन बात  वइसे कहे सुने के त बहुत कुछ बाटे बाकि अपने कविताई के सफऱ के हम इहाँ बतावल चाहब की कविता, गीत लिखे क सउख हमके हमार पिता जी से मिलल उनकर कविता आ छन्दन क हम अपने स्कूल के मंचन से पाठ भी करत रहली। कक्षा एक से लेके दसवीं तक हम गणतंत्र दिवस आ स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल के कवि सम्मेलन में भाग लेहीं आ खूब वाहवाही आ ताली बटोरी। अपने पिता जी क लिखल एक हास्य कविता - "अइलें देखनहरु त मनवा धधाय गयल,   हमके बोलउलें त मन शरमाय गयल।   देखलें त कहलें की लइका त हीरो बाय,   बाकी फुफ्फा बतउलें की पढ़े में जीरो बाय। " के लगभग हर मंच से सुनाईं। लोग खूब ताली बजावे आ सराहे। साथ साथ हम बावला जी एक कविता -  " एक दिन गइली रपट लिखावे, घबड़ायल कुछ माने में,    का बतलाईं ए भइया मोर जेब कट गयल थाने में। " क भी पाठ करी। बस येहीजे से कविता, गीत, छंद के प्रति रूचि बढ़े लगल। बावला जी क किताब "गीतलोक" के हम दू तीन बार पढ़ली। हाई स्कूल के बाद पढ़ाई करे बदे घर से बाहर जाये के पड़ल आ ओह किताब क एक्के प्रति रहला के वजह से हम कहीं लेके जा ना सकी त हम गीतलोक क पूरा पीडीएफ बनाके अप...

हे माधव

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आपाधापी लोक लाज का  काज तू निश्चित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का  अंत सुनिश्चित कर दे । रोजाना की उलझन मुझसे नहीं सही जाती केशव । व्याकुल मन की पीड़ा मुझसे नहीं कही जाती केशव । एक बाण से मृत्यु का, बसंत समर्पित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का  अंत सुनिश्चित कर दे । जग जाहिर है सब हारे हैं अपनों के आघात से । मेरे तरकस खाली हो गए धीरे धीरे हाथ से । या तो मेरी चिखों को, उल्लास से सिंचित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का  अंत सुनिश्चित कर दे । प्रत्यंचा पर चढ़ी शिखा है मेरे कुल के मान की । भंग होती मर्यादा अब तो आभा धूमिल शान की । टूट रहे परिवारों के, विश्वास तू निर्मित कर दे । हे माधव अब इस जीवन का  अंत सुनिश्चित कर दे । ~ धीरेन्द्र पांचाल 

अच्छी बात नहीं

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दिल से दिल के तार छुड़ाना अच्छी बात नहीं । सूरज पर प्रतिबन्ध लगाना अच्छी बात नहीं । तुमने चंचल राग सुनाया पर मेरी भी बात सुनो , व्याकुल मन की पीड़ा गाना अच्छी बात नहीं । रेत के टीले लग जाते हैं नदियों के तटबंधों पर , उनको आवारा कह जाना अच्छी बात नहीं । सबके अपने जख्म यहाँ हैं सबकी अपनी यादें , हर मरहम हो घाव दिखाना अच्छी बात नहीं । नदियाँ झरने झील समंदर सबके आदी हो जाना , मयखाने में आना जाना अच्छी बात नहीं । यौवन की मादकता कह लो या दिल का दीवानापन , इतना भी मन को समझाना अच्छी बात नहीं । ~ धीरेन्द्र पांचाल

तू भोर का एक टीमटीम तारा

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खूबसूरत वो लम्हे  संग तेरे बिताये  जैसे रुक ही हैं जाती  दो घड़ी को हवाएं  सारे ख्वाबों को मैंने  है संजोया अभी तक  तुझे अपने खयालों में  रक्खा सजाकर तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  मुस्कान बड़े मतवाले हैं  कैसे मैं इनसे बच पाऊं  वो बातें सचमुच प्यारी हैं इजहार करूँ या मर जाऊं सोचा ही नहीं तेरे दर पे मैं रुसवाई का सर चूमूंगा अब तन्हा हार चूका हूँ मैं तू जोगन एक पिटारा तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  ~ धीरेन्द्र पांचाल 

भटक रहे हैं लड़के अब भौकाल मचाने वाले

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भटक रहे हैं लड़के अब भौकाल मचाने वाले । काजल देख के उन आँखों का हाल बताने वाले । गांव की पगडण्डी से लेकर शहरों की फूलवारी तक, सिंच रहे हैं सबको, रोटी दाल कमाने वाले । सपने साधन से अपने वो दूर हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं खुद से भी प्यार निभाने वाले । इश्क़ में पड़ने वाले अब वो चुपके से रो लेते हैं, सब कुछ सह जाते हैं अब वो गाल बजाने वाले । बात हो जाती है जब उनसे मन ही मन खिल जाते हैं, इक लड़की के प्यार में सब न्यौछावर करने वाले । बड़े सलीके से रहते हैं छोड़ दिया आवारापन, बात बात में प्यार की खातिर लड़ भीड़ जाने वाले । सब कुछ सुनते कुछ ना कहते सहमे सहमे लगते हैं, उनके झुमके से अपना प्रतिबिम्ब बनाने वाले । ~ धीरेन्द्र पांचाल 

सोना सुग्गु जान करेजा

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बात प्यार क हमके ओकर तनिको समझ न आवे सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे  हम जानित है अपने मन से छुवल चाहत हे  अपने मन क सबरे पीड़ा धोवल चाहत हे  हम बहुते नालायक बानी के ओके समझावे  सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे हमरे दिल में प्यार क दियनी बारल चाहेले  येह पतझड़ में फुल कियारी रोपल चाहेले  हमरो मन फागुन होइ जाला बाबू कही बोलावे  सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे बस एक बिंदी हउवे ओकर माथे क सिंगार जइसे मिलल आसमान के चंदा एक उपहार खुद सीसा जस लागे अब के सीसा ओके देखावे सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे ~ धीरेन्द्र पांचाल

इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला

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मैंने अपनी जान हथेली पर उसके कर डाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला काश की मिल पाता मैं उनसे  हाल दिलों के गाता काश की इस बंजर धरती पर  अपने रंग उगाता  उसकी कातिल आँखों ने फिर हमपे रोब उछाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसका मिलना लगा की जैसे  नदियों के तट अम्बर  जैसे अपनी मंजिल को  पा लेता कोई सिकंदर  उसकी ख़ामोशी ने मुझमें मधुशाला भर डाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसके कांधे पर सर रख  उसकी धड़कन सुन पाऊं वो मेरी होकर रह जाये  मैं उसका हो जाऊं  उसने मेरे सूने दिल में किलकारी भर डाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसकी अंगड़ाई से जैसे  थम जाती पुरवाई थम जाती हो जैसे  जाने कितनों की तरुणाई  मैंने पूजा उसको जैसे पूजे कोई शिवाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला मैंने अपनी जान हथेली पर उसके कर डाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला ~ धीरेन्द्र पांचाल