मूसहर दुरी डेढ़ फीट
( मूसहर दुरी डेढ़ फीट - धीरेन्द्र पांचाल ) महलों की पीड़ा अनुभव करने वाले झोपड़ी में भीनभिनाती हुई मक्खीओं को देखकर घिन्ना जाते हैं उन्हें यहाँ बदबू और गंदगी दिखाई देती है संवेदना नहीं लेकिन संवेदनायें तो यहाँ भी हैं काश किसी को दिखाई दे । यह गद्य मेरी पीड़ा है मेरा भड़ास है की किस तरह समाज का एक तबका आज भी उसी बदहाली और गुमनामी का जीवन जी रहा है। भूतकाल मे उसके साथ भेदभाव हुआ की नहीं, शोषण हुआ की नहीं यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन उसकी गंध आज भी उसी रूप मे दिखाई पड़ती है तो अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि आज भी समाज मे लोग मुसहर कहकर एक दूसरे को चिढ़ाते हैं और सामने वाला आग बबूला हो जाता है की मूसहर मत कहना मतलब मूसहर आज सामान्य और मध्यम वर्गीय परिवार के लिए एक गाली बन गया है लेकिन उनकी इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ये तो उन पढ़े लिखे विचारक, सामाजिक चिंतक और कुछ तथाकथित कवियों, लेखकों को सोचना चाहिए की कैसे सबरी के जूठे बेर को प्रेम का प्रतिक बताते हैं और अपनी कविताओं और लेखनी मे खूब अच्छे अच्छे शब्दों की माला बनाकर श्रोताओं का माल्यार्पण करते हैं और वाहवाही लूटते हैं भाई वाह वाह क...

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