छात्र जीवन
बरगद पीपर महुआ आम क छांव याद आवेला ।
माई के अँचरा में गाँव गिरांव याद आवेला ।।
सोरहे बरिस में घर छूट गईल , रह गइलीं सुकुवारे ।
लोटा थरिया कुकर आपन इहे हव परिवारे ।
चाउर के गठरी से भयल अलगाव याद आवेला ।
माई के अँचरा में ............
राती के कोतवाल चनरमा आंख फार के ताके ।
नींद लगे जस भोरवे सूरज खिड़की चढ़के झाँके ।
चिरई चहके जस छागल के पाँव याद आवेला ।
माई के अँचरा में .............
बिना जतन हम दाल भात अउर चोखा ताव से खाईं ।
इश्क भयल जब चाय से हमके रत रत भर जग जाईं ।
माई के रोटी प लगावल छाव याद आवेला ।
माई के अँचरा में .............
आधी रोटी में मेहमानन के पता बतावे कउआ ।
इहवाँ चारा खाके मनई हो जालें लखनऊआ ।
दुअरे निबकौड़ी के भयल बिखराव याद आवेला ।
माई के अँचरा में .............
✍धीरेन्द्र पांचाल

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