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माफ हमको कीजिये

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इस विलासी भावना से          साफ दिल को कीजिये । प्रेम अगर सम्भोग है          तो माफ हमको कीजिये । होटलों के फर्श तक हम बेहयाई लाँघकर । बण्डलों पर नोट के ईमान अपने फांदकर । जा सके न देह के व्यापार को देने दिशा । मासूका की गोद में कैसे बिताते यूँ निशा ? है बुजुर्गों का अदब          ना राख हमको कीजिये । प्रेम अगर सम्भोग है          तो माफ हमको कीजिये । वासना की कामना में देह की दीवार को । ढाहते कैसे भला हम प्रेम की मिनार को ? सिसकियाँ आती हैं देखी पुष्प के किरदार से । कब कहाँ कैसे बचोगे कंटकों के वार से ? हम समंदर ठीक हैं          ना भाप हमको कीजिये । प्रेम अगर सम्भोग है          तो माफ हमको कीजिये । यह उदासी प्रेम की निष्काम सी सम्भावना है । जायसी रसखान मीरा की सतत उपासना है । इस रइसी में न कोई डूबने की कामना । हम उपासक राम...

प्रश्न हमार

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हो गयल भवसागर जे पार , ताके उहो तड़ेर के आंख । सोच समझ के दिहीं जबाब , ना बा कउनो अलग दबाव । चतुराई से तरकस रखले शान पे बान चलउलस के , पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।  हम त बिगरल काम बनाईं , पानी पर सेतु पऊड़ाईं । मोर क्षमता पे प्रश्न तोहार , फिर से तनिका करा बिचार । सागर के पुरुसारथ अपने अंजुरी से खरकउलस के , पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।  अवधपुरी के हईं दुलार , काशी मथुरा हवे हमार । शिल्पकार हम गंगा के , डमरू शिव अड़भंगा के । केशव के उ चक्र सुदर्शन अंगूरी में पहिनउलस के , पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।  ना केहुओ से राखी तोड़ , सबका खातिर चार चार गोड़ । राम के हाथे धनुष थमउली , संसाधन सबका पहुँचउली । शस्त्र शास्त्र के विद्या हमरै हमहि से लुकवऊलस के , पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।  केसे केकर रहल लड़ाई , हम ना कबहुँ बैर निभाईं । हम केकरा के रहीं चुनौती , जे एह गति के हमरो हस्ती । कहे कथानक जे कथावाचक हमरै कथा छुपउलस के , पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । ✍ धीरेन्द्र पांचाल