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Showing posts from November, 2025

अच्छी बात नहीं

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दिल से दिल के तार छुड़ाना अच्छी बात नहीं । सूरज पर प्रतिबन्ध लगाना अच्छी बात नहीं । तुमने चंचल राग सुनाया पर मेरी भी बात सुनो , व्याकुल मन की पीड़ा गाना अच्छी बात नहीं । रेत के टीले लग जाते हैं नदियों के तटबंधों पर , उनको आवारा कह जाना अच्छी बात नहीं । सबके अपने जख्म यहाँ हैं सबकी अपनी यादें , हर मरहम हो घाव दिखाना अच्छी बात नहीं । नदियाँ झरने झील समंदर सबके आदी हो जाना , मयखाने में आना जाना अच्छी बात नहीं । यौवन की मादकता कह लो या दिल का दीवानापन , इतना भी मन को समझाना अच्छी बात नहीं । ~ धीरेन्द्र पांचाल

तू भोर का एक टीमटीम तारा

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खूबसूरत वो लम्हे  संग तेरे बिताये  जैसे रुक ही हैं जाती  दो घड़ी को हवाएं  सारे ख्वाबों को मैंने  है संजोया अभी तक  तुझे अपने खयालों में  रक्खा सजाकर तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  मुस्कान बड़े मतवाले हैं  कैसे मैं इनसे बच पाऊं  वो बातें सचमुच प्यारी हैं इजहार करूँ या मर जाऊं सोचा ही नहीं तेरे दर पे मैं रुसवाई का सर चूमूंगा अब तन्हा हार चूका हूँ मैं तू जोगन एक पिटारा तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  तू साँझ की धुप सी लगती है तू भोर का एक टीमटीम तारा  ~ धीरेन्द्र पांचाल 

भटक रहे हैं लड़के अब भौकाल मचाने वाले

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भटक रहे हैं लड़के अब भौकाल मचाने वाले । काजल देख के उन आँखों का हाल बताने वाले । गांव की पगडण्डी से लेकर शहरों की फूलवारी तक, सिंच रहे हैं सबको, रोटी दाल कमाने वाले । सपने साधन से अपने वो दूर हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं खुद से भी प्यार निभाने वाले । इश्क़ में पड़ने वाले अब वो चुपके से रो लेते हैं, सब कुछ सह जाते हैं अब वो गाल बजाने वाले । बात हो जाती है जब उनसे मन ही मन खिल जाते हैं, इक लड़की के प्यार में सब न्यौछावर करने वाले । बड़े सलीके से रहते हैं छोड़ दिया आवारापन, बात बात में प्यार की खातिर लड़ भीड़ जाने वाले । सब कुछ सुनते कुछ ना कहते सहमे सहमे लगते हैं, उनके झुमके से अपना प्रतिबिम्ब बनाने वाले । ~ धीरेन्द्र पांचाल 

सोना सुग्गु जान करेजा

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बात प्यार क हमके ओकर तनिको समझ न आवे सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे  हम जानित है अपने मन से छुवल चाहत हे  अपने मन क सबरे पीड़ा धोवल चाहत हे  हम बहुते नालायक बानी के ओके समझावे  सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे हमरे दिल में प्यार क दियनी बारल चाहेले  येह पतझड़ में फुल कियारी रोपल चाहेले  हमरो मन फागुन होइ जाला बाबू कही बोलावे  सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे बस एक बिंदी हउवे ओकर माथे क सिंगार जइसे मिलल आसमान के चंदा एक उपहार खुद सीसा जस लागे अब के सीसा ओके देखावे सोना सुग्गु जान करेजा कही कही के बतियावे ~ धीरेन्द्र पांचाल

इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला

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मैंने अपनी जान हथेली पर उसके कर डाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला काश की मिल पाता मैं उनसे  हाल दिलों के गाता काश की इस बंजर धरती पर  अपने रंग उगाता  उसकी कातिल आँखों ने फिर हमपे रोब उछाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसका मिलना लगा की जैसे  नदियों के तट अम्बर  जैसे अपनी मंजिल को  पा लेता कोई सिकंदर  उसकी ख़ामोशी ने मुझमें मधुशाला भर डाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसके कांधे पर सर रख  उसकी धड़कन सुन पाऊं वो मेरी होकर रह जाये  मैं उसका हो जाऊं  उसने मेरे सूने दिल में किलकारी भर डाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला उसकी अंगड़ाई से जैसे  थम जाती पुरवाई थम जाती हो जैसे  जाने कितनों की तरुणाई  मैंने पूजा उसको जैसे पूजे कोई शिवाला इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला मैंने अपनी जान हथेली पर उसके कर डाला  इक देवी ने इस दिल को देवालय कर डाला ~ धीरेन्द्र पांचाल

मूसहर दुरी डेढ़ फीट

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( मूसहर दुरी डेढ़ फीट- धीरेन्द्र पांचाल ) प्रमुख गोत्र......... भारतीय समाज को चार वर्णों के आधार पर जाना जाता है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । इन सभी वर्णों में कई जातियाँ हैं और सभी जातियों के अपने गोत्र होते हैं इनमे मुसहर समाज के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार हैं - सूर्य, काशी, कश्यप, शबरी, पाली, रिखमुन, ऋषिमुनी, दैतेनिया, बालकुमतुनी, वंशघट, दनहरिया, सुरपुरखा, कासमेटा इत्यादि ।  हमारे गोत्र से हमारे पूर्वजों की पहचान होती है की हम किस कुल किस वंश से सम्बन्ध रखते हैं यहाँ गोत्र का एक और मतलब होता है गो यानि गाय की रक्षा करने वाला ।  विदेशी आक्रांताओं के आने के बाद भारतीय समाज में ढेर सारे फेर बदल हुए बहुत सी जातियों को इनके ही जड़ से अलग थलग करके एक अलग शोषित,वंचित, छोटे - बड़े जैसे समूहों में बाँट दिया गया । फुट डालो राज करो वाले सिद्धांत में ये आक्रांता सफल रहे । तमाम जातियों को इनके रूट से अलग करके इनके कर्म के आधार पर इनकी जाति बना दी गई । यहाँ वेद पुराण की बात सब करते हैं लेकिन मानता कोई नहीं यहाँ लोग आपको संवैधानिक आधार पर मिले केटेगरी के हिसाब से ऊंच नीच मानते है...

मूसहर दुरी डेढ़ फीट

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( मूसहर दुरी डेढ़ फीट - धीरेन्द्र पांचाल ) महलों की पीड़ा अनुभव करने वाले झोपड़ी में भीनभिनाती हुई मक्खीओं को देखकर घिन्ना जाते हैं उन्हें यहाँ बदबू और गंदगी दिखाई देती है संवेदना नहीं लेकिन संवेदनायें तो यहाँ भी हैं काश किसी को दिखाई दे । यह गद्य मेरी पीड़ा है मेरा भड़ास है की किस तरह समाज का एक तबका आज भी उसी बदहाली और गुमनामी का जीवन जी रहा है। भूतकाल मे उसके साथ भेदभाव हुआ की नहीं, शोषण हुआ की नहीं यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन उसकी गंध आज भी उसी रूप मे दिखाई पड़ती है तो अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि आज भी समाज मे लोग मुसहर कहकर एक दूसरे को चिढ़ाते हैं और सामने वाला आग बबूला हो जाता है की मूसहर मत कहना मतलब मूसहर आज सामान्य और मध्यम वर्गीय परिवार के लिए एक गाली बन गया है लेकिन उनकी इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ये तो उन पढ़े लिखे विचारक, सामाजिक चिंतक और कुछ तथाकथित कवियों, लेखकों को सोचना चाहिए की कैसे सबरी के जूठे बेर को प्रेम का प्रतिक बताते हैं और अपनी कविताओं और लेखनी मे खूब अच्छे अच्छे शब्दों की माला बनाकर श्रोताओं का माल्यार्पण करते हैं और वाहवाही लूटते हैं भाई वाह वाह क...